कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्
◆ डॉ स्वाति चौधरी
हे म
नुष्य! तू यदि सोचता है कि कर्म करूँगा तो फल पाऊँगा, और फल न मिले तो ईंट-गारा, जूता-चप्पल, मुक़दमा-इल्ज़ाम धर दूँगा—तो तू भ्रम में है। अरे भोले प्राणी! तू फल पर क्यों हक़ जमाता है, जैसे बरगद की छाँव पर ठेला जमाने वाला ठेलेवाला? समझ ले, यह सृष्टि यंत्रवत है और तू उसमें एक नट-बोल्ट भर। बोल्ट अगर यह कहे कि वह इंजन के चलने में राजा है, तो नट के हँसने का ठिकाना न रहेगा।
कर्म कर, बिना ललचाए! अबे, भगवान ने कह दिया: "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन", पर तू है कि फल पर निगाह गड़ा के बैठा है, जैसे भूखा बिल्ला रसोई पर। भगवद्गीता को तू मोटिवेशनल किताब समझ बैठा है, और सोचता है कि दो पन्ना पढ़ के प्रमोशन मिल जाए!
हे चातकचित मानस! जब अर्जुन को रणभूमि में खड़ा करके श्रीकृष्ण बोले कि "कर्म कर, फल की चिंता मत कर", तब अर्जुन सोच में पड़ गया कि "यह फल न मिलने वाली स्कीम तो बड़ी रिस्की है!" पर श्रीकृष्ण भी ठहरे द्वारिकाधीश—वे बोले, "अरे मूढ़! कर्म करेगा तो फल अपने आप मिलेगा। न भी मिले तो तेरे कर्म का हिसाब ब्रह्मांड की एक्सेल शीट में दर्ज रहेगा।"
अब देखो, इसी सिद्धांत को पकड़ कर हरिकृष्ण जी ने गाँव में नया डेयरी खोल दिया। बोले, "दूध दुहूँगा, पर दाम की चिंता नहीं करूँगा।" पहले दिन बीस लीटर निकला, दूसरे दिन गाय ने लात मार दी, तीसरे दिन गाँव वालों ने उधार पर दूध उठा लिया, और महीने के अंत में हरिकृष्ण जी दूध नहीं, आँसू पीने लगे। तब किसी ज्ञानी ने टोका, "भाई, गीता ने फल की चिंता न करने को कहा, पर ये तो नहीं कहा कि लेन-देन की रजिस्टर ही मत रखो!"
अब आओ एक और पात्र पर—श्रीमान भजन प्रसाद। इनके मन में ठन गया, कि हर सुबह पार्क में योग करेंगे। कर्म करेंगे, पर फल की चाह नहीं रखेंगे। पहले दिन 4 बजे उठे, हवा में टाँगें फैलाईं, मुर्गे ने देखा तो बांग देना बंद कर दिया। दूसरे दिन भाभी जी ने कहा, "फल नहीं खाना तो योग भी रहने दो।" तीसरे दिन देखा कि योग करते-करते सड़क पर ठेला लग चुका है और ठेले पर "फल रस" बिक रहा है।
कहते हैं कर्म निष्काम हो, पर निष्कामता का आशय यह नहीं, कि बंदा "काम से निष्क्रांत" हो जाए। आजकल के बाबाओं ने इसे नया रूप दे दिया है—"कर्म करो, पर तन से नहीं, मन से; और मन को भेज दो कहीं और।" एक बाबा तो बोले, "फल की कामना मत करो, फल खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।" दूसरे बोले, "फल से मोह मिटाओ, चॉकलेट खाओ।"
देखो बंधु! इस सूत्र वाक्य का मज़ाक उड़ाने वाले आज LinkedIn पर पोस्ट डालते हैं, "मैंने कर्म किया, फल ख़ुद-ब-ख़ुद CEO की कुर्सी बनकर आ गया।" सच्चाई यह है कि कर्म किया किसी और ने, फल आया किसी और को, और बीच में दलालों ने "consultancy" शुल्क खा लिया।
आजकल की शिक्षा व्यवस्था भी इस सूत्र की ऐसी-तैसी करने में पीछे नहीं। बच्चे बोर्ड परीक्षा में खपते रहते हैं, सोचते हैं कि फल मिलेगा – मेडिकल, इंजीनियरिंग, नौकरी या कम-से-कम लड़की/लड़का की नज़र! पर परीक्षा के बाद फल मिलता है – "बहुत अच्छा प्रयास किया", "better luck next time", और बगल में बैठा रोहन IIT चला जाता है – वो भी कोटा में मटरगश्ती करते हुए।
अब बात करते हैं राजनीति की। हमारे नेता भी कर्म करते हैं—भाषण देना, पत्थर पर फीता काटना, और जनता की समस्याओं पर "दृढ़ चिंता" करना। पर जब कोई पूछे "फल कहाँ है?" तो नेता मुस्कुरा के कहे, "भाई साहब! आप गीता नहीं पढ़ते क्या? फल की कामना करने वाला मनुष्य मोह का शिकार होता है।" फिर खुद अगले चुनाव में टिकट के फल पर जिह्वा लपलपाते हैं!
किसान कर्म करता है – खेत जोतता है, बीज बोता है, पानी-पसीना बहाता है। पर फल आता है – बारिश की बर्बादी, मंडी में दलाली, और सरकार की घोषणा: "MSP जल्द बढ़ाई जाएगी, मगर अगले पंचवर्षीय योजना में।" ...और तब किसान कहता है, "मुझे नहीं चाहिए फल, बस बीमा क्लेम मिल जाए।"
और देखो, इसी सूत्र को पत्नी ने पकड़ा—पति से बोली, "मैं जो तुम्हारे लिए सारा दिन करती हूँ, खाना, सफ़ाई, लिस्ट बनाना, सास की सेवा, बच्चों की पढ़ाई—मैं कोई फल की चाह में नहीं करती!" पर जैसे ही पति भूल से "आज खाना में नमक ज़्यादा है" कह दे—तो फल निकलता है; रात का उपवास, खाना में मिर्च ज़्यादा नमक कम, कहीं-कहीं बेलन के रूप में इत्यादि!
अब तो कंपनियों ने भी इस सूत्र को HR नीति में डाल दिया है। कर्म करो, डेडलाइन पूरी करो, 60 घंटे काम करो, पर appraisal के समय याद दिलाया जाता है, "Do not expect rewards; we value intrinsic motivation." ...और उसी intrinsic motivation को measure करने बैठते हैं Excel sheet में 5x5 matrix से।
बाबा तुलसी ने ठीक ही कहा:
"पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं"
किंतु, कर्म के बिना मनुष्य केवल सपनों में ही राज करता है।
पर आज का मनुष्य कहे, "कर्म करूँ, और फल भी न मिले? तो फिर क्यों करूँ?"
उससे कहो—हे कुतर्की! तेरी ये सोच वही है जैसे कोई कहे, "मैं पेड़ लगाऊँगा नहीं, पर फल चाहिए आम के ...और यदि पेड़ लगाने को कहो तो पहले पूछूँगा: पेड़ लगाने के बाद 3 साल में फल आएगा या नहीं?" अरे मूर्ख! पेड़ लगाने वाले कभी फल के लिए नहीं लगाते; वे छाया, हवा और पीढ़ी की सोच रखते हैं।
फिर भी, ये देशफलनायक (fruit-heads) चाहते हैं instant gratification। कर्म भी Whatsapp status जैसा हो और फल भी Flipkart, Amazon express delivery जैसा। यदि एक हफ्ते में Instagram reel न चली तो रचयिता स्वयं को कालिदास मानकर खड़ग उठाता है—"इस जनता को कला का मूल्य ही नहीं।"
हे मानव! तू फल के पीछे भागता है, जैसे कौआ बासी रोटी के पीछे। पर फल भागते हैं उस मनुष्य के पीछे, जो कर्म में रमा है, फल की आकांक्षा से रहित है। जैसे तुलसीदासजी ने लिखा—
"राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम"
वे नहीं बोले कि "राम काज करूँ, और राम जी मुझे मोटिवेशनल कोर्स में प्रमोट करें।" उन्होंने कर्म किया, और फल आया—रामचरितमानस के रूप में, जो युगों-युगों तक चलेगा।
अब अंत में, हे पाठक! यदि तू यहाँ तक पढ़ आया है, तो तू भी कर्मयोगी है, क्योंकि आज की दुनिया में 5-6000 शब्द पढ़ना एक तपस्या है। तू फल न माँग, इस व्यंग्य से हास्य ले जा, मन की गहनता में थोड़ा चिंतन ले जा, और यदि इच्छा हो तो मित्रों के संग बाँट, ताकि वे भी जान सकें—
कि, "कर्म कर, फल की चिंता मत कर, क्योंकि फल कभी अमरूद की तरह सीधे नहीं आता; कभी-कभी चप्पल की तरह ऊपर से आता है।"
जय श्रीकृष्ण!
जय कर्म!
जय व्यंग्य!