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साहित्य

कहानी" परवेश"

◆ बख्तावर हनीफ

"अरे भाई हमेशा नकारात्मक बात करते हो साबिर मियां, कभी इस मुंह से अच्छी बात भी निकाल दिया करो, क्यों जहर भरते हो इन नौजवानों के दिमाग में? जब पढ़ेंगे लिखेंगे तब ही तो आगे बढ़ेंगे। नसीम भाई ने सब के सामने साबिर मियां की बोलती बंद कर दी। दरअसल साबिर मियां अपनी और अपने बच्चों की नाकामी पर ध्यान न देकर दूसरो की कमी हमेशा निकालते रहते। जहां भी मौका मिलता सरकार को कोसने और व्यवस्था पर टीका टिप्पणी का कोई मौका नहीं छोड़ते। उनका एक ही तकिया कलाम था, अरे! इस सरकार में मुसलमानों को कहा नौकरी मिलेगी, सब जगह घूस चल रही है। दिन भर में जितनी बार यह बात कहते अगर इतनी बार बच्चों से घर में बैठकर पढ़ाई-लिखाई करने को कह देते तो बच्चों और खुद को यह दिन न देखने पड़ते। हुसैन बाग मौहल्ले की मिली जुली आबादी थी। जहां से हिंदू आबादी शुरू होती वहां न घरों से म्यूजिक की तेज आवाजें आती न सड़कों पर लड़कों के हुजूम एक दम शांत माहौल। परवेज नसीम भाई का बेटा था, वो मौहल्ले के अन्य लड़कों के विपरीत घर में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगा रहता। अगर कभी घर से बाहर भी निकलता तो अपने दोस्त रमेश के घर चला जाता जिसका घर पड़ौस में ही था वहां दोनों बैठकर पढ़ाई करते।

साबिर मियां के अपने लड़के तो दसवीं फेल से आगे नहीं पढ़ पाये। अक्सर वो परवेज को देखकर यह कहने से नहीं चूकते, बेटा! क्यों वक्त जाया कर रहे हो, मुसलमान को कहां सरकारी नौकरी नसीब में है, जितनी जल्दी हो सकै कोई हाथ का हुनर सीख कर अपने पैरों पर खड़े हो जाओ। परवेज़ उनकी इस बात पर कोई जवाब नहीं देता और सलाम करते हुए आगे बढ़ जाता। बैंक में क्लेरिकल स्टाफ की भर्ती का विज्ञापन आने पर चुपचाप परवेज़ ने आवेदन कर दिया और अपनी पढ़ाई में लगा रहा। परीक्षा भी हो गयी, परवेज़ दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं में व्यस्त हो गया। एक दिन रोजगार समाचार पढ़ते हुये परवेज की नजर बैंक के रिजल्ट पर गयी, अरे! यह तो उसी बैंक का रिजल्ट है जो मैं देकर आया हूं, बुदबुदाते हुए परवेज ने कहा और जल्दी -जल्दी अपना एडमिट कार्ड निकाला, उसका दिल दुगनी तिगुनी जोर से धड़क रहा था, ऊंगली भी रिजल्ट देखते हुए कांप रही थी, उसकी आंखों को यकीन नहीं हो रहा था कि उसका रोल नम्बर अखबार में छपा था , दो तीन बार उसने आंखों को रगड़ कर यकीन किया कि उसका ही नम्बर छपा है। वो खुशी से बोला, अब्बा ओरिएंटल बैंक में नौकरी लग गयी। अब्बा की आवाज आयी, किसकी लग गयी? परवेज ने कहा, मेरी लग गयी रिजल्ट आया अखबार में। पूरे मौहल्ले में हवा की तरह बात फैल गयी, आखिरकार मौहल्ले के पहले मुस्लिम लड़के की नौकरी लगी थी वो भी सरकारी।

साबिर मियां ने जब यह सुना तो उनके तो कलेजे पर सांप ही लौट गया, अपने घर में घुसते ही अपने बेटों पर आफत मचा दी, नालायको खबीसो! परवेज़ की सरकारी नौकरी लग गयी, तुमने पढ़ कर नहीं दिया। साबिर मियां बोलबाल कर खुद ही चुप गये किसी बच्चे ने कोई जवाब नहीं दिया।

आखिरकार परवेज़ की पोस्टिंग पंजाब के एक कस्बे बुढलाडा जिला मनसा में हो गयी। नौकरी की खुशी बिछुड़ने के गम को आंखों में समेटे हुए परवेज ने अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान किया। दूसरे दिन बैंक पहुंच कर परवेज़ ने अपनी ज्वाइनिंग दी। बैंक मैनेजर ने स्टाफ से मिलवाया। जैसे ही परवेज़ के नाम का पता चलता सब अजीब और आश्चर्यजनक प्रतिक्रिया देते। परवेज समझ नहीं पाया कि माजरा क्या है?

परवेज़ के बराबर वाली सीट उसके सीनियर आर के शर्मा की थी। परवेज़ ने शर्मा जी से कहा, सर। मुझे रहने के लिए कमरा लेना है, बैंक के पास ही मिल जाए।

शर्मा जी ने कहा, परवेज़ा यहां के लिए तू अजूबा है, यह पंजाबियों और सिखों का शहर है यहां कोई मुसलमान नहीं रहता और ये जो यहां सिख, पंजाबी रहते हैं किसी मुसलमान को घर किराए पर नहीं देते। परवेज ने कहा, सर! तो मैं कहां रहूंगा? परवेज़ के चेहरे पर चिंता की रेखाएं खिंच गयी। शर्माजी। ने कहा , चल परवेज़ देखते हैं, समस्या है तो हल भी जरुर होगा।

एक दो दिन के लिए बैंक में बने गार्ड रूम में ही परवेज़ को रात गुजारनी पड़ी। दो तीन जगह मकान देखे भी तो, बैचलर को मकान नहीं देते, कह कर नाम पता पूछने से पहले ही मना कर दिया।

परवेज़ के पास अब कपड़े भी खत्म हो रहे थे, कपड़े धुलने का नम्बर आ गया था, गार्ड रूम में नींद भी सही से नहीं आ रही थी।

बैंक में शर्मा जी ने परवेज़ का बुझा चेहरा देखकर कहा, यार बेटा मैं तुझे वहां कमरा नहीं दिलवाना चाह रहा था, साला वो डीसी बहुत नालायक और मुसलमानों से बहुत नफरत करता है, लेकिन कमरे बहुत अच्छे हैं उसके यहां, साफ़ सुथरे बिल्कुल।

'चल आ यार चलते जो होगा देखा जायेगा, यह कहते हुए शाम को शर्मा जी और परवेज डी सी के घर पहुंचे।

परवेज ने देखा छः फिट दो इंच का लम्बा चौड़ा सिक्ख जवान उनके सामने था। शर्मा जी को देखते ही बोला, सत् सिरी काल अंकल! कैवयी आना होया? शर्मा जी ने पंजाबी में कहा, डी सी, तेरे घर विच किराये पर देन लयी कोई कमरा खाली है ?

डीसी ने हंसते हुए कहा, बैंक वालों नू कमरा क्यों नहीं किराये ते मिलेगा अंकल, जरूर मिलेगा। किसनू कमरा लेना है?

शर्मा जी ने कहा, ये हैं अभी तीन चार दिन पहले ज्वाइन किया है।

डी सी ने परवेज़ की ओर देखते हुए कहा, तुसी चिंता ना करो कमरा समझो मिल गया बस आपणा सामान रख लेणा, बैंक वालियां नून कमरा क्यों नहीं मिलेगा?

डी सी आगे आगे और शर्मा जी पीछे पीछे। डी सी ने अपने घर में जो सबसे अच्छा और सेपरेट वन रुम सेट था उसको दरवाजा खोलते हुए कहा, लो जी, इही रिहा तुम्हारा कमरा अज्ज तो ही इत्थे आराम करो।

कमरा वाकई बहुत अच्छा साफ सुथरा और बड़ा था। रसोई और बाथरूम भी चमचमा रहे थे। शर्मा जी और परवेज़ को तुरंत पसंद आ गया। शर्मा जी ने पूछा," डी सी। इसका किराया कितना है? डी सी ने हंसते हुए कहा, दिन रात दा काम है मेरा तान बैंक द, हूं बैंक वालियां किराया मागदा होया चंगा लगेगा जो मर्जी है ओह दे देना ।

न तो डी सी ने परवेज़ का नाम पूछा न शर्मा जी ने उसको परवेज का नाम बताया।

वापस आते हुए परवेज ने शर्मा जी से कहा, डी सी ने मेरा नाम तो पूछा ही नहीं।

शर्मा जी ने कहा, मैंने सोच लिया है तुम्हें क्या बताना है, जब वो नाम पूछे तो, तुम कहना प्रवेश या परवेश और इस के आगे कुछ नहीं बताना। फिलहाल तो यहीं रहो बाद में ढूंढ लेना कहीं। अगर बात बिगड़ी तो कह देंगे, नाम बताया तो था तेरी समझ नहीं आया तो क्या करें?

परवेज की समझ में आ गयी लेकिन वो सोच रहा था किसी को धोखे में रखना सही नहीं और कमरा भी देखता रहूंगा, लेकिन फिलहाल क्या किया जाए, रात को गार्ड शराब पीकर शोर मचाते हैं, कुते अलग से रात भर भौंकते हैं, पूरी रात बिना सोये ही निकल जाती है। अभी के लिए तो यही सही है।

डी सी की कस्बे में ही किराना की बड़ी दुकान थी ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था। देखने में पूरा गवरु जवान था । ओरिएंटल बैंक ऑफ कामर्स में उसका करेंट और बचत खाता था। यदा कदा लोन भी ले लेता था। बैंक में उसका रोज का ही आना जाना था। उसका मस्त और थोड़ा जल्दी इमोशनल होने वाला व्यक्तित्व था। बैंक में सब उसको जानते थे और यह भी सबको पता था ये पाकिस्तानी रिफ्यूजी है और बहुत मेहनत मजदूरी करके अपना धंधा सेट किया है। गुरु‌द्वारे में प्रतिदिन पाठ करने और वहां कार सेवा से उसकी दिनचर्या प्रारंभ होती।

उसके घर में उसकी मां के अलावा एक छोटी भांजी रहती थी उसकी दो बहनों की शादी होकर अपने अपने परिवारो में व्यस्त थी।

परवेज़ अक्सर बैंक जाते हुए व आते समय डी सी की मां को सत् श्री अकाल कह कर जरूर निकलता और स्वास्थ्य के बारे में पूछ लेता।

आज डी सी बैंक आया हुआ था, परवेज की नजर उस पर पड़ी तो आवाज दी, डी सी भाई ! अंदर आ जाओ। जैसे ही डी सी चैम्बर की ओर आया तो गार्ड ने रोक दिया, लेकिन परवेज़ ने कहा, गार्ड साब ! रोको नहीं मैंने बुलाया है। डी सी को परवेज़ ने अपने पास पड़ी कुर्सी पर बैठा लिया।

डी सी भाई कैसे आना हुआ परवेज़ ने पूछा। डी सी ने जवाब दिया, कुछ कैश जमा करना था और ये चैक कैश कराने थे। परवेज़ ने चपरासी को आवाज लगाई और कहा, पानी ले आओ इसके बाद चाय पिलवाओ डी सी भाई को। डी सी के लिए यह बड़े सम्मान की बात थी, उसका तो पूरा दिन इस काम में खराब हो जाता था और लाइन में धक्के अलग। परवेज़ से डी सी ने शर्माते हुए कहा, वीर जी तुसी रोट है, चाय वाय पिला कर शर्मिंदा न करो ।

परवेज़ भाई ने कहा, डी सी भाई आपको बैंक आने की क्या जरूरत थी, मुझे बता देते मैं शाम को दे देता

जितने देर में चाय आयी, परवेज ने जल्दी जल्दी सारे काम डी सी के करा दिये। परवेज़ का यह व्यवहार डी सी के दिल में घर कर गया।

अब तो शाम को अक्सर डी सी परवेज़ के कमरे पर चला जाता, कभी खाने के लिए कुल्चे तो कभी तंदूरी पराठा तो कभी लस्सी का जग भर कर रख देता।

एक दिन भारत पाकिस्तान का क्रिकेट मैच चल रहा था। डी सी मैच में भावनात्मक रूप से जुड़ा था। बीच-बीच में पाकिस्तान को गाली भी दे रहा था। परवेज़ ने हंसते हुए कहा, क्या हुआ डी सी बड़ी गाली निकल रही हैं। डीसी ने कहा, परवेश! मैंनूं मुल्लियां तो बड़ी नफरत है। विभाजन के बखत मेरे पापा, एक भाई, एक बहन की लाश रेलगाड्डी विच्च अमृतसर आई सी।। मैं, मेरे चाचा और मेरी मां छिपदे छिपांदे रेलगाड्डी विच्च जैसे तैसे जान बचाकर इंडिया आये। साडी खेती, घर, बलद, गाय, भैंसें सब पाकिस्तान छूट गयी। यह कहते हुए डी सी बहुत भावुक हो गया, उसकी आंखों में आसूं आ गये। नफ़रत का भाव उसके चेहरे पर था जो परवेज़ को भयभीत कर रहा था।

परवेज़ ने हिम्मत करके कहा डी सी यह तो बहुत गलत हुआ लेकिन विभाजन के समय दोनों ओर से हिंसा हुई थी, समय बहुत आगे निकल चुका है, बेकार में इतना गुस्सा करते हो।

बात आयी गयी हो गयी। एक दिन डी सी परवेज़ को गुरद्वारे लंगर के लिए ले गया, परवेज़ ने शुरू में तो मना ही किया था परन्तु उसके प्रेम और जिद की बजह से जाना ही पड़ा। डी सी ने कहा, चलो। मैं तुहानूं पूरा गुरु‌द्वारा घुमाउंदा हां।

परवेज उसके पीछे-पीछे चलता गया। पहले उसने गुरु‌द्वारे के अंदर बना सरोवर दिखाया, जिसमें रंग बिरंगी मछलियां बड़ी सुंदर लग रही थी। उसके बाद वो सिखों के इतिहास से सम्बंधित दीवारों पर उकेरी पेंटिंग दिखाते हुए उनके बारे में बताता जा रहा था। परवेश वीर जी! यह देखो, इह साडे पहले गुरु गुरु नानक जी हन, किन्ने शांत आते सि‌द्धे लग रहे हैं इहनां ने समानता अते भाई चारे दा पाठ सिखाया।

परवेज ने कहा, हां! इतिहास में पढ़ा है हमने। आगे आगे चलते हुए गुरु गोविन्द जी के शहीद पुत्रों और बंदा बहादुर के बलिदान, कटे शीश की पेंटिंग दिखाते हुए डी सी की आंखों में आक्रोश चेहरे पर क्रोध, नफरत और बदले की भावनाएं साफ दिख रही थी। इन पेंटिंगो की ओर इशारा करते हुए डी सी बोला, मुल्लों नूं बहुत नफरत है मुझे, मुगलों ने साड्डे उत्ते बहत अत्याचार कीता है। साढ़े गुरु के छोटे-छोटे बच्चे शहीद हो गये। इसके बाद वो गर्व के साथ महाराजा रणजीत सिंह की एक बहुत भव्य पेंटिंग के पास जाकर रुक गया और बोला, इह साड्डी सिक्ख कौम दे बादशाह ने। तैनूं पता ए इंहां दे राज विच ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान में दिल्ली तक सिक्खां दा राज सी। अफगाना नूं आपणी तलवार नाल मौत दे घाट उतार दिता सी इंहां ने।। अंग्रेज वी इंहां तों डरे रहिंदे सन। यह बताते हुए उसके चेहरे पर सिख कौम का शौर्य और विरासत का गौरव झलक रहा था।

परवेज़ का उन पेंटिंग को देखकर दिल बैठ गया और बोला, डी सी बिर्दर भूख लग रही है, खाना खाने चलते हैं।

डी सी ने कहा, तुसी खाणे दी की फिकर कीती? खाणा तां एत्थे ही मिलेगा लंगर विच्च बहुत वधिया। आंखों चलो खाणा खांदे हां।

परवेज़ को डी सी ने लंगर में यह कहते हुए कि मैनेजर साहब है अच्छे से खाना खिलाओ, कह कर बहुत ही स्वादिष्ट हलुआ खिलाया। परवेज़ ने इतना स्वादिष्ट हलुआ कभी नहीं खाया था।

गुरु‌द्वारा घूम कर परवेज़ अपने कमरे में आ गया। गुरु‌द्वारे की पेंटिंग और उन्हें देखकर डी सी के चेहरे पर आने वाले भावों ने उनके अंदर भय और बैचेनी पैदा कर दी, 'अगर डी सी को पता चल गया मैं मुसलमान हूं तो न जाने क्या करेगा। अच्छा फंसवाया शर्माजी ने इसका मकान दिलवाकर, अब तो दूसरा कोई मकान ढूंढना ही पड़ेगा।'

यह सोचते सोचते परवेज़ को नींद आ गयी।

एक दिन हुआ यह कि डी सी की अम्मा का सफाई करते हुए पैर रपट गया उनके सिर और पैर में अच्छी खासी चोट लग गयी। इतवार का दिन था बैंक बंद था घर पर परवेज़ ही था जैसे उसने 'धड़ाम की आवाज सुनी बाहर को आया तो देखा आंटी जी काफी जोर से फिसल गयी थी उनसे उठा भी नहीं जा रहा था, उनके सिर से काफी खून बह रहा था। पैर में भी चोट आयी थी। परवेज़ ने एक दो लोगों को और बुलाकर आंटी को उठाया और अस्पताल में इमरजेंसी में भर्ती करा दिया। वहां इमरजेंसी में आंटी को ओ निगेटिव ब्लड की आवश्यकता थी क्योंकि आंटी का ब्लड ग्रुप ओ निगेटिव था। तब तक डी सी भी आ चुका था। डी सी का ब्लड ग्रुप मैच नहीं कर रहा था। कुछ पड़ोसी तो ब्लड देने के नाम से ही खिसक लिये कुछ ने बीमार होने का बहाना बना लिया। परवेज़ ने कहा, डी सी भाई चिंता नहीं करो, मेरा ब्लड ग्रुप ओ निगेटिव है जितने ब्लड की जरूरत पड़ेगी मैं दूंगा।

इतना सुनकर डी सी की आंखों में आसूं आ गये। परवेज़ ने तीन यूनिट ब्लड आंटी को दे दिया। कुछ देर में आंटी खतरे से बाहर आ गयी।

परवेज़ ने डी सी को बिल्कुल भी नहीं महसूस होने दिया कि वो अकेला है। छु‌ट्टी वाले दिन पूरी पूरी रात आंटी की देखभाल अस्पताल में करता। शुरू के पांच दिन तो बैंक ही नहीं गया दिन में आंटी के पास ही रहता। डी सी अपनी दुकानदारी बंद करने के बाद रात को अपनी मां के पास रहता।

आंटी छः महीने में बिल्कुल ठीक हो गयी थी। परवेज़ को कहती, तू मेरा दूसरा बेटा है जो पाकिस्तान में मैंने कहीं खो दिया था। डी सी का अब परवेज़ से अटूट रिश्ता था ऐसा लगता ही नहीं था कि वो भाई भाई नहीं हैं।

परवेज़ को इस बैंक में दो साल हो गये थे। ट्रांसफ़र के लिए एप्लाई कर रखा था। आज बैंक में ट्रांसफर की लिस्ट आ गयी थी। परवेज का ट्रांसफर अपने शहर ऊधम सिंह नगर उत्तराखंड हो गया।

शर्माजी के साथ साथ डी सी भी परवेज़ का सामान पैक कर रहा था। आंटी और डी सी की बहनें भी परवेज़ को बिदाई देने आ गयी थी। चलते वक्त सब की आंखों में आसूं थे आंटी तो परवेज़ को सीने से लगाकर बार बार यही कह रही थी," मेरा बेटा मुझे छोड़कर कहां जा रहा है कितने दिनों बाद मिला था।"

शर्मा जी ने डी सी की आंखों में आंसू की धार देखकर कहा, डी सी! ये परवेज़ हसन है न कि परवेश।" पहले तो डी सी समझा नहीं। शर्मा जी ने फिर कहा, ये परवेज़ हसन है मोमंडन न तूने कभी पूछा न हमने बताया, मकान नहीं मिल रहा था इसे, वो तूने दे दिया था।"

इतना सुनकर डी सी ने परवेज़ को अपने सीने से लगा लिया और बोला वीर जी मैं तो माफ़ी मांगने लायक भी नहीं रहा, आपने मुझे मज़हब का मतलब बता दिया, आज मुझे समझ आ गया, कोई धर्म बुरा नहीं होता, मुसलमानों में आप जैसे फरिस्ते भी है। आप मेरे दुःख-सुख में सगे भाई की तरह खड़े रहे इतना ही नहीं मेरी माँ को जीवनदान दिया,उनकी की रगो में आपका खून दौड़ रहा है। आज से आप मेरे धर्म भाई...कभी कोई मेरी जरूरत पड़े तो याद कर लेना, यह डी सी अपना खून देने में पीछे नहीं हटेगा.... आज परवेज़ हसन भी अपने को हल्का महसूस कर रहा था, डी सी व उसके परिवार का अपनत्व व प्यार के साथ उसकी भावुक विदाई परवेज़ की आखों को नमन कर गई थी



सम्प्रति: सहायक आबकारी आयुक्त मेरठ के पद पर कार्यरत।

सम्पर्क: 8958543422


लेखक बख्तावर हनीफ़ जी कर दो कहानी संग्रह' हिजाब वाली लड़की," मेरे बचपन के राम प्रकाशित, चालीस से अधिक कहानियां, व्यंग, लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके है।