भूकंप जैसा रहा “कॉकरोच” आंदोलन
◆ अमरेंद्र कुमार राय
किसी आंदोलन की तुलना भूकंप से करना ठीक नहीं। क्योंकि भूकंप बिना बताए आता है और कुछ सेकेंड या कुछ मिनट में बहुत कुछ तहस नहस करके चला जाता है। लेकिन नतीजों के मामले में देखें तो “कॉकरोच” आंदोलन ने सरकारी तंत्र और सत्ताधारी दल, खासकर उसके सर्वशक्तिमान नेता को भूकंप से हुए नुकसान जैसा ही नुकसान पहुंचाया है।
आप आंदोलन से पहले और आंदोलन के बाद के हालात को देखिये। आंदोलन से पहले लोगों के मन में डर बैठा हुआ था। हर किसी को ये लगता था कि पता नहीं कब कौन सी बात सरकार और सत्ताधारी दल को बुरी लग जाए और उसके दरवाजे पर ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स के दस्ते पहुंच जाएं। अगर आप उत्तर प्रदेश के हैं तो इससे भी बड़ा डर बुलडोजर का था। मध्यम वर्ग और गरीब तबका आजकल अपना ज्यादा समय सोशल मीडिया पर गुजारता है। उसे भी डर था कि ऐसा कुछ न लिखो ताकि सरकार की तिरछी नजर पड़े। कई पत्रकार, कई यू ट्यूबर, कई सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग जेल की हवा खा चुके हैं। कुछ पर तो ऐसे मुकदमे लाद दिये गये कि महीनों उनकी जमानत ही नहीं हुई। लेकिन अब आंदोलन के बाद लोगों के भीतर बैठा यह डर जाता रहा। छात्रों ने जिस तरह से पुलिस तंत्र की तानाशाही का मुकाबला किया वह देखने लायक था। उन्होंने पुलिस के आतंक को भी हंसी-हंसी में उड़ा दिया। दिल्ली में जंतर मंतर पर बैठे छात्रों का आंदोलन देश के दूसरे हिस्सों में भी फूटा। पटना, मुंबई, अलमोड़ा, देहरादून और भी कई जगह। छात्रों ने क्या किया ? पुलिस ने जो बैरिकेड लगाये उसे रेल के खिलौने की तरह दौड़ाने लगे। वे पुलिस से पूछने लगे कि हमारी पिटाई की तैयारी ठीक से किये हैं कि नहीं? पुलिस के पास अगर टीयर गैस नहीं दिखी तो हंसकर पूछने लगे कि अरे सिपाही जी टीयर गैस नहीं लाये हैं क्या ? आप लोग एक भी काम ठीक से नहीं करते। अच्छा चलिये अगर टीयर गैसे नहीं लाए हैं तो पानी की बौछार ही कर दीजिए। और जब पुलिस ने पानी का प्रेशर छात्रों पर छोड़ा तो वे नाचने लगे। मुंबई में तो एक लड़की हिरासत में लिये गये छात्रों को ले जा रही बस के सामने अकेले ही खड़ी हो गई। कहा- या तो छात्रों को छोड़ो या फिर मुझे कुचल कर आगे बढ़ो। दिल्ली में जब पुलिस ने बर्बर लाठी चार्ज किया तो एक छात्र गुस्से से आग बबूला हो गया। वो बार बार कहने लगा मारो, मुझे और मारो। पुलिस के दो तीन जवानों ने उसे मारा भी। लेकिन उसकी जिद देखकर उन्हें अपने हाथ रोकने पड़े।
यह छात्रों का पहला ऐसा आंदोलन था जिसमें छात्राओं की भरपूर भागीदारी थी। जो छात्राएं दिल्ली जैसी जगह में रात को बाहर निकलने से डरती हैं, वे रात-रात भर जंतर मंतर पर डटी रहीं। इनमें से कुछ छात्राएं तो अपने घरों से बगावत करके आईं। घर वालों ने यहां तक धमकी दे दी कि वे अगर जंतर मंतर पर आंदोलन में भाग लेने गईं तो उनके लिए घर के दरवाजे बंद कर दिये जाएंगे। फिर भी वो नहीं डरीं। वो भाग लेने वहां गईं। उनमें से कुछ जब अपने घर पहुंचीं तो वाकई उनके माता-पिता ने दरवाजा नहीं खोला। वे भी लौट गईं और जंतर मंतर को ही उन्होंने अपना घर बना लिया। गुरुद्वारा या किसी ऐसी ही सार्वजनिक जगह पर वो खाना खाती थीं और जाकर सो जाती थीं। आंदोलन में शरीक कई लड़कियों ने तो यहां तक कहा कि वे इससे पहले इतनी सुरक्षित कभी महसूस नहीं कर पाईं। हजारों की भीड़, कंधे से कंधा छिल रहा है लेकिन किसी ने भी “बैड टच” नहीं किया। हां, पुलिस वालों के लिए जरूर उन्होंने कहा कि वे प्राइवेट पार्ट पर मारते थे। वे कपड़े भी ऐसी जगह पकड़ते थे कि उनके प्राइवेट पार्ट दिखने लगें। ये इस आंदोलन की बहुत बड़ी सफलता कही जाएगी जिसमें छात्राओं, महिलाओं को सुरक्षा महसूस हुई। नई पीढ़ी में ये एक बड़े सामाजिक बदलाव का संकेत है।
अभी तक का इतिहास यही रहा है कि आंदोलन हिंसक हो जाता था और सरकार उसी को आधार बनाकर दमन शुरू करती थी और आंदोलन खत्म हो जाता था। लेकिन इस बार छात्रों ने गजब की शांति दिखाई। पुलिस ने कई बार छात्रों को उकसाने की कोशिश की। लेकिन छात्रों ने अपनी समझदारी से उन्हें भी शांत कराया और अपने साथियों को भी। पुलिस ने जब बर्बर ढंग से लाठी चार्ज किया, आंसू गैस के गोले छोड़े यहां तक कि पैलेट गन भी चलाई गई पर छात्र शांत रहे। उसी का नतीजा निकला कि जो सरकार यह कहती थी कि यह यूपीए की सरकार नहीं है, इसमें इस्तीफे नहीं होते, उसके एक बड़े मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। धर्मेंद्र प्रधान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चहेते मंत्री हैं। ऐसे बहुत कम मंत्री हैं जो उनकी तीनों बार की सरकार में मंत्री रहे हों। धर्मेंद्र प्रधान उनमें से एक थे। वे पिछले बारह वर्षों से मोदी सरकार में मंत्री थे। इतना ही नहीं उनका कद हर सरकार में बढता गया। 2014 में वे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय में राज्य मंत्री ( स्वतंत्र प्रभार ) थे। 2017 में उनका कद बढ़ाकर उन्हें कैबिनेट मंत्री बना दिया गया। उनके पास कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय रहा। 2019 से 2024 तक वे इस्पात मंत्रालय में थे। और अब शिक्षा मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण विभाग देख रहे थे जिसे कभी अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ, प्रभावशाली और सम्मानित नेता देखते थे।
इस आंदोलन ने एक और बहुत बड़ा काम किया है। जिस मोदी जी की छवि निखारने और सुधारने के लिए हजारों करोड़ रुपये खर्च किये गये, उस छवि को कॉकरोच आंदोलन ने बहुत गहरे जमीन के अंदर गाड़ दिया। सत्तर सालों में किसी प्रधानमंत्री को ऐसी गालियां नहीं मिलीं जैसी मोदी जी को दी गईं। जितनी गालियां मोदी जी ने अपने पूरे 12 साल के कार्यकाल में नहीं खाईं, आंदोलन के इन 26 दिनों में खाईं। मोदी जी ने एक बार एक जनसभा में कहा था कि विरोधी उन्हें रोज कई किलो गालियां देते हैं। लेकिन ईश्वर ने उन्हें ऐसी शक्ति दी है कि ये गालियां उनके भीतर जाकर पोषण या सकारात्मक ऊर्जी में बदल जाती हैं। लेकिन इस बार की गालियां कुछ खास हैं। ये उनके विरोधियों ने नहीं दी हैं, बल्कि इस देश के भविष्य छात्रों ने दी है। वो भी ऐसी कि जुबान पर लाई नहीं जा रहीं। ये ऐसी गालियां हैं जो कोई भी शर्मदार व्यक्ति जल्दी भूलेगा नहीं। मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा कि वह मोदी जी को इतनी शक्ति दे कि वे गालियों के इस असह्य अपमान को भूल सकें और आगे से ऐसे कार्य न करें कि उन्हें फिर से गालियां खानी पड़ें।