चंद्रशेखर ने जीता छात्रों का विश्वास, आंदोलन के बने सबसे बड़े नायक आज़ाद समाज पार्टी की रणनीति ने मोदी सरकार को लाया घुटनों पर, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से टूटा अहंकार
नई दिल्ली ( मुक्तिदीप ) नीट यूजी पेपर लीक प्रकरण को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन उस समय निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया, जब 15 जुलाई को आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद जंतर-मंतर स्थित धरनास्थल पर पहुंचे। उन्होंने छात्रों का उत्साहवर्धन करते हुए घोषणा की कि 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर ऐसा जनसैलाब उमड़ेगा, जिसे सरकार चाहकर भी रोक नहीं पाएगी। इसके बाद चंद्रशेखर आजाद ने इस आंदोलन को अपनी प्रतिष्ठा का विषय बनाते हुए दिन-रात इसकी रणनीति बनाने और उसे सफल बनाने में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया।
आंदोलन के दौरान चंद्रशेखर आजाद देर रात दो बजे धरनास्थल पहुंचे और पूरी रात छात्रों के बीच डटे रहे। 20 जुलाई को छात्रों पर पुलिस की कार्रवाई और लाठीचार्ज से आहत होकर उन्होंने संसद परिसर में बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के समक्ष अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया। लगातार बारिश और तमाम राजनीतिक दबाव के बावजूद वे अपने संकल्प से पीछे नहीं हटे।
इसके बाद 25 जुलाई को चंद्रशेखर आजाद ने देशव्यापी आंदोलन का आह्वान करते हुए आज़ाद समाज पार्टी के कार्यकर्ताओं को सभी जिलों में प्रदर्शन करने का निर्देश दिया, जबकि स्वयं उन्होंने लखनऊ में आयोजित विशाल प्रदर्शन का नेतृत्व किया। उनकी रणनीति और नेतृत्व में आंदोलन लगातार तेज़ होता गया और सरकार पर दबाव बढ़ता गया।
आंदोलन से बढ़ते जनदबाव के बीच सरकार को पहले सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त कराने के लिए आश्वासन देना पड़ा और बाद में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की घोषणा आंदोलन की बड़ी लोकतांत्रिक जीत के रूप में सामने आई।
जब लाखों छात्र अपने भविष्य को लेकर सड़कों पर संघर्ष कर रहे थे और अधिकांश राजनीतिक दल केवल बयानबाज़ी तक सीमित थे, तब चंद्रशेखर आजाद ने छात्रों की लड़ाई को अपनी लड़ाई बनाकर राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठाया। उस समय अहंकार से भरी मोदी सरकार छात्रों की मांगे मानना तो दूर उनसे बात तक करने के लिए तैयार नहीं थी।
सरकार के आदेश पर 20 जुलाई को शांतिपूर्ण संसद मार्च की तैयारी कर रहे छात्रों पर लाठियां बरसाई गई। आंसू गैस के गोले छोड़े गए। जिसमें भारी संख्या छात्र घायल हुई। छात्राओं के साथ मारपीट और बुरा बर्ताव किया गया ताकि इस आंदोलन को कुचला जा सके, लेकिन छात्रों के अडिग संघर्ष और आंदोलन के नेतृत्व ने सरकार को झुकने के लिए मजबूर कर दिया।
आंदोलन के परिणामस्वरूप छात्रों की प्रमुख मांगों पर कार्रवाई हुई। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा, 47 अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की गई, किसी भी छात्र के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई न करने का आश्वासन दिया गया तथा नीट पेपर लीक प्रकरण से प्रभावित और जान गंवाने वाले छात्रों के परिजनों को मुआवजा देने का भरोसा भी सरकार की ओर से दिया गया।
इस आंदोलन ने करोड़ों युवाओं की आवाज़ को राष्ट्रीय मंच प्रदान किया। शिक्षा व्यवस्था पर देशव्यापी बहस छिड़ी, सरकार को छात्रों की मांगों पर गंभीरता से विचार करना पड़ा और युवाओं में लोकतांत्रिक संघर्ष के प्रति नया विश्वास एवं उम्मीद पैदा हुई।
छात्रों ने यह भी माना कि सच्चा हीरो वही होता है, जो संकट की घड़ी में आगे बढ़कर संघर्ष करता है। चंद्रशेखर आजाद ने छात्रों के सपनों और अधिकारों की रक्षा के लिए हर मोर्चे पर उनका साथ दिया और आंदोलन को निर्णायक मुकाम तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
चंद्रशेखर आजाद ने केवल राजनीतिक बयान देने तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि छात्रों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझा, संघर्ष का नेतृत्व किया और अंत तक उनके साथ मजबूती से खड़े रहे। यही कारण है कि बड़ी संख्या में छात्र उन्हें इस आंदोलन की सफलता का प्रमुख सूत्रधार और "युवाओं का असली हीरो" मानते हैं।